Saturday, June 25, 2011

आम आदमी और कांग्रेस का हाथ...जमकर पडती महंगाई की लात



केन्द्र में बैठी कांग्रेस की सरकार ने फिर से आम जनता पर मंहगाई का वज्रपात कर दिया है। पेट्रोल, डीजल, क़िरोसिन और घरेलू इंधनो के मूल्य मे बढोत्तरी कर केन्द्र सरकार ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि उसका आम लोगों के साथ कोई लेना-देना नही है। वस्तुत: यह सरकार अमीरों एवं पूंजीपतियों का एक ऐसा दीमक है जो धीरे=धीरे आम जनता या फिर यों कह ले की गरीब जनता के अस्तित्व को समाप्त कर जायेगा। चुनाव मे कांग्रेस ने  जो दावा किया था कि आम आदमी के साथ कांग्रेस का हाथ रहेगा ..वो केवल एक छ्लावा भर था। वो मात्र एक स्लोगन था , जिसका सही समय पर सही प्रयोग किया जा रहा था।

आज पेट्रोल, डीजल, क़िरोसिन और घरेलू इंधनो के मूल्य मे बढोत्तरी... कई और पदार्थों के दाम को आसमान तक ले जाने वाली है.. इससे आम जन की क्या दुर्गती होगी ये समझा जा सकता है। दूध के दाम,  मांस तथा मछली के दाम, दाल, चावल, गेहूं के दाम.. साथ ही साथ अन्य खाद्य वस्तुओं पर भी इस मूल्य वृद्धी के दूरगामी परिणाम नजर आने वाले है। आज देश की आम जनता सकते मे है और उसे इस बात का भी पूरा-पूरा अहसास है कि आने वाले दिन उसके लिए एक बडी आफत लाने वाली रहेगी। पर उनके इस आफत पर बडी बडी अर्थशास्त्रीय भाषाओं का ताला जड दिया जायेगा इस बात की भी पूरी संभावना है।

कहते है कि यदि किसी कार्य को पर्याप्त रूप से छोटे-छोटे चरणों मे बाँट दिया जाय तो कोई भी काम आसानी से पूरा किया जा सकता है । ये सरकार आज उसी नीति को अपना कर महंगाई को छोटे छोटे चरणों मे बांट कर बहुत ज्यादा बढा चूंकि है। मंहगाई अगर इसी तरह कुछ छोटे छोटे चरणों मे बढता रहा तो भारत मे केवल दो वर्ग वाला ही रह जायेगा..एक अमीर और एक गरीब । महात्मा गाँधी का ऐसा मानना था कि गरीबी दैवी अभिशाप नहीं बल्कि मानवरचित षडयन्त्र है । आज तो इस बात के प्रमाण बिलकुल साफ नजर आ रहे है। वैसे केन्द्र सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि सर्वसाधारण जनता की उपेक्षा एक बड़ा राष्ट्रीय अपराध है । और जब जनता अपनी उपेक्षा का हिसाब लेना शुरू करेगी तो यह दादागिरी धरी की धरी रह जायेगी।

केन्द्र मे बैठी सरकार इस सच को भी समझने का प्रयास करे कि लोकतंत्र एक विशेष धारणा पर आधारित है कि साधारण लोगों में असाधारण संभावनाएँ होती है..और ऐसी असाधारण संभावनाएँ भारत के इतिहास मे कई बडे परिवर्तन भी ला चुकी है। केन्द्र सरकार आज महंगाई तथा और भी कई अन्य मुद्दों पर अपना रवैया तानाशाही का रखे हुए है। उसे आम लोगों के जीवन मे हो रही परेशानियों को दूर करने मे कोई भी रूचि नही है। आज के भारतवर्ष मे वही लोकतंत्र है जहां धनवान, नियम पर शाशन करते हैं और नियम, निर्धनों पर । आज सरकारी व्यवस्था भष्ट्राचार के मकडजाल मे उलझी बैठी हुई है। और कहीं न कहीं उस व्यवस्था का सबसे बडा शिकार आम आदमी ही बन रहा है। ..........हां.,,बाबा रामदेव सरीखे लोगों को इससे कुछ फर्क पडने वाला नही..वैसे कहां है आजकल रामदेव????



Thursday, June 2, 2011

क्या गम है जिसको छुपा रहे हो?



आंखो मे नमी हंसी लबों पर ...क्या बात है क्या छुपा रहे हो? हिप हिप हुर्रे ,अर्थ तथा और भी कई फिल्मों मे अपने शानदार अभिनय से जीवंत करने वाले राजकिरण आज अमेरिका के एक मेंटल असाइलम मे अपनी जिंदगी के गुमनाम दौर को जी रहे हैं । असफलता जब आती है तो हर तरफ से आती है और ये बात राजकिरण के साथ भी घटी ...फिल्म मे किस्मत से मार खाने के बाद जब व्यसाय से जुडे तो वहां भी असफलता ने दामन पकडे रखा नतीजा वो शारीरिक रूप से बीमार रहने लगे और परिवार ने भी उनका साथ छोड़ दिया। अपनापन ही प्यारा लगता है, यह आत्मीयता जिस पदार्थ अथवा प्राणी के साथ जुड़ जाती है, वह आत्मीय, परम प्रिय लगने लगती है। और यही अपनापन जब छूट जाता जाता है तब इंसान अपने आप को पूरी तरह से खो देता है।

राजकिरण के साथ भी यही होता दिखाई दे रहा है।  रूपहले पर्दे पर खूबसूरत मुस्कान बिखेरने वाला एक फिल्मी सितारा आज रोने की स्थिती मे भी नही है। अपने आप को एक परिवार बताने क दंभ भरता हिन्दी फिल्मी दुनिया की असलियत यही है। कभी नादिरा, तो कभी ऐ.के.हंगल, कभी साधना तो कभी परवीन बाबी...कितने ऐसे नाम हमे यहां मिलेंगे जो जीवन के अकेलेपन से जूझते हुए कुंठा का शिकार हो बैठे और ये रंगीन दुनिया बडी आसानी से अपनी राह चलता चला गया। बालीवुड हमेशा से बडी आदर्शों की बात करता रहा मगर जिस आदर्श के व्यवहार का प्रभाव न हो, वह फिजूल है और जो व्यवहार आदर्श प्रेरित न हो, वह भयंकर है। ये दोनो बातें आज बालिवुड का हिस्सा बन चुकी है।

इस चकाचौंध की दुनिया मे जाने कितनो के दम घुट गये इस बात के कई प्रमाण है...मगर जो बात सबसे ज्यादा टीस पहुंचाती है वो यह है कि आखिर यहां ऐसा क्यूं है? यहां जरा सी असफलता ने आपको छुआ नही कि आप श्रापित मान लिए जाते हैं। इस बालीवुड मे सफलता एक सार्वजनिक उत्सव है , जबकि असफलता व्यक्तिगत शोक । और जब कोई व्यक्तिगत शोक के लिए अकेला पड जाता है, तब उसकी जिंदगी मे आनेवाले आंसू किसी को दिखते नहीं। हमारा बालीवुड इस बात पर अडिग रहता है कि संसार में प्रायः सभी जन सुखी एवं धनशाली मनुष्यों के शुभेच्छु हुआ करते हैं। विपत्ति में पड़े मनुष्यों के प्रियकारी दुर्लभ होते हैं।

वैसे भी विपत्ति में पड़े हुए का साथ बिरला ही कोई देता है। आज राजकिरण का साथ देने के लिए ऋषि कपूर और दिप्ती नवल जैसे इंसानी कलाकार आगे आ रहे हैं। अगर इसी तरह से पूरा बालीवुड आगे आये तो निश्चित तौर पर यह मानव-कल्याण की दिशा मे एक बडा कदम होगा। पर क्या ऐसा हो पाएगा.?..क्योंकि ये दुनिया तो मानती है कि अर्थो हि लोके पुरुषस्य बन्धु:- संसार मे धन ही आदमी का भाई है। और बिना धन वाले विपत्ति मे पडे एक इंसान के प्रति क्या इनकी कोई संवेदनशीलता नजर आ पाएगी? खैर ये तो समय ही बताएगा..पर संभावना बहुत कम नजर आती है।

आज राजकिरण को निस्तेज हो चले हैं और निस्तेज मनुष्य का समाज तिरस्कार करता है । तिरष्कृत मनुष्य में वैराग्य भाव उत्पन्न हो जाते हैं और तब मनुष्य को शोक होने लगता है । जब मनुष्य शोकातुर होता है तो उसकी बुद्धि क्षीण होने लगती है और बुद्धिहीन मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है । आज राजकिरण जिस सर्वनाश के द्वार पर खडे हैं क्या इससे उन्हें कोई बाहर ला पाएगा? ये सवाल आज बालीवुड के सामने सर उठा कर खडी है कि आखिर वो अपने परिवार के एक सदस्य की कोई मदद करेगा ? इस व्यस्त दुनिया के लोग क्या कुछ समय निकालने का प्रयास करेंगे?

मानवी चेतना का परावलंबन - अन्तःस्फुरणा का मूर्छाग्रस्त होना , आज की सबसे बडी समस्या है । इस समस्या से निकल पाना बडा कठिन माना जाता है ....सच मे यह दिख भी रहा है। इस बालीवुड मे इतने सारे लोग और इतनी थोडी सोच ! अगर यहां कोई सालों से लापता है तो उसे पता करने के बजाये लोग उसे मृत मान लेने मे ज्यादा सहूलियत महसूस करते हैं। यहां ज्ञान की बाते तो बहुत की जाती है पर आचरण? आचरण के बिना ज्ञान केवल भार होता है, शायद इस बात से यहां के लोग बिलकुल अंजान है...या फिर अंजान बनने का ढोंग भी तो कर सकते हैं। यहां कुछ भी हो सकता है..और हो भी क्यूं न....ये सितारों की दुनिया जो ठहरी।

हजारों मील की यात्रा भी प्रथम चरण से ही आरम्भ होती है । इस सितारों की दुनिया को अब दुबारा किसी अपने को गुमनामी से बचाने के लिए प्रथम चरण बढाने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए। खुशियों और पार्टियों का दौर चलाने वाला बालीवुड क्या राजकिरण को फिर से एक नयी जिंदगी देने के दिशा मे कोई कदम बढाने वाला है? भलाई का एक छोटा सा काम हजारों प्रार्थनाओं से बढकर है । आशा करता हूं कि राजकिरण फिर से हमे रूपहले पर्दे पर दिखाई दे और हम सभी उन्हे फिर से उसी जगह का हिस्सा बनते देखें जहां की बेरूखी ने उन्हे जीवन से इतना अलग कर दिया है। साथ ही साथ उन सभी गुमनाम सितारों को भी एक बार पुन: वैसे ही सम्मान दिए जाने की जरूरत है जो कभी इस दुनिया से उन्हे मिला था। इस दिशा मे बालीवुड को निश्चित रूप से एक ठोस एवं कदम उठाने की जरूरत है।

विषयों, व्यसनों और विलासों में सुख खोजना बंद कर हमारी फिल्मी दुनिया कुछ ऐसे कार्य करे कि भविष्य मे फिर कोई राजकिरण किसी मेंटल अस्पताल मे न जाने पाये। ऐ,के,हंगल जैसे मंझे हुए वृद्ध अभिनेता अपने को धारा से अलग-थलग न पाए....न कोई नादिरा गुमनामी की मौत मरे....और ना ही कोई रौशनी से अंधेरे की गर्त मे अपने को डूबा पाए। सूरज और चांद को हम अपने जन्म के समय से ही देखते चले आ रहे हैं। फिर भी यह दुर्भाग्य है कि हम यह नहीं जान पाये कि काम कैसे करने चाहिए ? निराशा सम्भव को असम्भव बना देती है । अत: हम मिलकर यह कोशिश करें कि कोई निराश न होने पाए।


















Monday, May 30, 2011

लोकतंत्र के चौथे प्रहरी अब जागें


सूचना के माध्यम लोकतंत्र मे चौथे स्तम्भ माने जाते हैं और प्रत्येक नागरिक की इनसे अपेक्षा है कि उसे सही सूचना दें । संचार माध्यमों या समाचारपत्र की चतुर्थ सत्ता संज्ञा की सार्थकता तभी है जब वे सत्य की सूचना पाठकों को देते रहे । इस दृष्टि से अब मीडिया के दायित्व निर्वाह पर उंगलियां उठने लगी है । निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए सूचनाओं को विकृत करके, उन्हे आधे-अधूरे रूप मे प्रस्तुत करके, उनमें तिल का ताड बनाने की कला का प्रदर्शन करके, अप्रमाणित को प्रमाणित का रूप देकर जनसंचार माध्यम आज अपने पैर पर कुलहाडी मार रहे हैं । ऐसा कहा जाता है कि अध्ययन, विचार, मनन, विश्वास एवं आचरण द्वार जब एक मार्ग को मजबूति से पकड़ लिया जाता है, तो अभीष्ट उद्देश्य को प्राप्त करना बहुत सरल हो जाता है। मगर आज की मीडिया ने अपने आप को इन बातों से कोसों दूर रखा है ।


जिस प्रकार अभिव्यक्त्ति की आजादी का हमारे देश मे धडल्ले से दुरूपयोग हो रहा है, उसी प्रकार सूचना के क्षेत्र मे भी दायित्वहीन आजादी देश के लिए अनर्थकारी सिद्ध हो रही है । हम प्रतिदिन राजनीति के अपराधीकरण और उसमे लगे हुए भ्रष्ट्राचार जैसे दीमक की बात करते हैं, पर्ंतु संचार माध्यमों के भ्रष्ट्राचार, अपराधीकरण और माफियाकरण के विरूद्ध कुछ कहने से परहेज करते है । इलेक्ट्रानिक मीडिया हो या प्रिंट मीडिया दोनों ही आदर्शहीन होकर तथ्यों के नाम पर नंगापन, वीभत्स और कुसंस्कार परोस रहे हैं । सुबह का अखबार देखिए, चोरी, डकैती, बलात्कार, हत्याएं, दंगे, फसाद, दुर्घटनाएं, चरित्र हनन, अधनंगे, वीभत्स और मन को खिन्न कर देने वाले समाचारों एवं दृश्यों से ये भरे पडे होते है । टेलिविजन पर समाचार चैनलों की बाढ सी आयी हुई है, मगर वहां की स्थिती और भी ज्यादा बद्दतर दिखती है । इन माध्यमों को समाज के और भी कई मुद्दों से सरोकार रखने की जरूरत थी, पर व्यवसायिकरण और चाटुकारिता ने मीडिया को दलाल बनाकर रख दिया है ।

अगर हम अमेरिका पर नजर डाले तो वहां समाचारपत्रों की स्वतंत्रता के लिए संविधान मे अलग से प्रावधान किया गया है, लेकिन भारत देश मे ऐसा नही है । यही कारण है कि भारत मे दूसरे उधोगों मे उपस्थित सारी दुष्प्रवृत्तियां इस क्षेत्र में प्रवेश कर गई हैं । जहां तक अभिव्यक्त्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न है, लिखने, पढने, बोलने, संकेत करने, नाटक-नौटंकी, सभा-प्रदर्शन करने जैसी सभी स्वतंत्रताएं इसी के अधीन आती हैं । इसलिए समाचारपत्र निकालने के लिए भी कोई योग्यता नही निर्धारित की गई है। संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत मिली कोई भी स्वतंत्रता निर्बाध नही है और उस पर युक्त्तियुक्त्त प्रतिबन्ध है । आज की मीडिया अपने आप को दोषरहित साबित करने पर तुली रहती है जबकी उसे यह समझना चाहिए कि अपने दोषों की ओर से अनभिज्ञ रहने से बढ़कर प्रमाद इस संसार में और कोई दूसरा नहीं हो सकता।

आज हमारे देश मे संचार के जितने भी साधन हैं उनमे अखबार और फिल्म उधोग तो प्राइवेट सेक्टर के मालिकों के इशारों और उनकी नीतियों पर चलती है और दूरदर्शन और आकाशवाणी सरकार मे बैठे लोगों की नीति पर आचरण करती है । बाकी बचे जो प्राइवेट चैनल है उनके सम्मान मे क्या कहा जाए और कितना कहा जाए इसपर तो एक ग्रंथ लिखा जा सकता है । दृष्टिकोण की श्रेष्ठता ही वस्तुत: मानव जीवन की श्रेष्ठता है और अगर दृष्टिकोण का ही अभाव हो जाए तो इंसान जिस ओर मुडेगा उसमे समाज के हितों का बलिदान लेना उसका प्रथम उद्देश्य बन जाएगा । आज मीडिया का एक बडा वर्ग समाज के हितों से खिलवाड करने पर तुला हुआ है ...शायद वह यह नही जान पा रहा है कि मनुष्य का अपने आपसे बढ़कर न कोई शत्रु है, न मित्र।

प्रेस के लिए खतरा केवल सत्ता की ओर से नही आता बल्कि वह उसके अंदर से भी आता है । यदि पत्रकार सत्ता का, चाहे आर्थिक हो या राजनैतिक, बहुत आदर करने लगे...और यदि वह अपने पेशे की निष्ठा की उपेक्षा करके लोकप्रिय बनना चाहे तो उससे प्रेस की स्वाधीनता अपने आप खतरे में पड जाएगी। वैसे स्वाधीनता मूल अर्थों मे छोटे के विरूद्ध मनमानी करने की स्वाधीनता रहा है । एक बडी बात तो यह भी है कि हम अभी तक इस समस्या से निजात नही पा रहे है कि छोटों को किस प्रकार स्वाधीनता दिलाए। यह बात हमारी समस्त अर्थ वयवस्था के बारे मे सही है और यह बात हमारे मीडिया पर भी लागू होती है। निश्चित रूप से हमे इस समस्या की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए। क्योंकि अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है।

स्वतंत्र प्रेस के कारण ही हम सभी सुरक्षित हैं, यह एक सार्वभौम सत्य है। आवश्यक है कि लोकतंत्र के चौथे प्रहरी अब जागें, देश के बुद्धिजीवी साहित्यकार, समाजसेवी जागे, समाज-सुधारक जागें, देश की युवा-शक्त्ति संगठित हो और इन भ्रष्ट्राचार और भ्रष्ट्राचारियों के खिलाफ एक वैसा ही संघर्ष छेड दें जैसा कभी अंग्रजों के विरूद्ध किया गया था। राष्ट्रिय चरित्र के अध: पतन के इस दौर मे राष्ट्रिय चेतना और राष्ट्रभक्त्ति की मशाल जलाने मे मीडिया को एक अग्रणी भूमिका निभाने के लिए तैयार होना ही पडेगा। अपना आदर्श उपस्थित करके और ज्यादा मुखर होना ही पडेगा ...माना कि आज परिस्थितियां प्रतिकूल हैं पर इसमे अधीरता न दिखाते हुए एक सच्ची शिक्षा प्रस्तुत करने का भी वक्त अभी ही है। नैतिकता, प्रतिष्ठाओं में सबसे अधिक मूल्यवान्‌ है, आज की मीडिया को इसे समझना ही होगा ।
      

      

Sunday, May 29, 2011

सुशासन मे रणक्षेत्र........ये सरकारी मानसिकता समझ के परे है ?


मुंगेर में जिला मुख्यालय स्थित जिला स्कूल केंद्र पर हो रहे शिक्षक पात्रता परीक्षा फार्म की बिक्री के दौरान अभ्यर्थियों ने जमकर बवाल काटा। आक्रोशित अभ्यर्थियों ने फार्म बिक्री केंद्र पर पथराव किया, जिससे केंद्र पर अफरातफरी मच गयी। पथराव के दौरान लगभग आधा दर्जन अभ्यर्थी घायल हो गये और विद्यालय की कई खिड़कियों के शीशे टूट गये । इसी तरह का हाल मुजफ्फरपुर  का भी रहा ....वहां भी दर्जनों छात्र डीईओ ऑफिस पहुंच गए। फॉर्म वितरण को लेकर संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर छात्रों ने प्रदर्शन शुरू कर दिये।

कमोबेश यही स्थिती जमुई की भी रही ..यहां भी शिक्षक पात्रता परीक्षा का फार्म मिलने में अनियमितता और ड्राफ्ट बनाने में अभ्यर्थियों हुई परेशानी का गुस्सा आखिरकार फूट पड़ा। करीब चार घंटे तक जमुई शहर आक्रोशित अभ्यर्थियों का बंधक बना रहा । अब जो प्रश्न उभरता है कि आखिर ये सब हो क्या रहा है और क्या इस पूरी प्रक्रिया को शांती से भी करवायी जा सकती थी या नही ? एक ही जवाब है कि बिहार के विकाश गीत गुनगुनाते सरकार और उसके विभाग  अगर थोडी सी समझदारी दिखाते तो इस तरह की नौबत कभी नही आती ।        

प्रारंभिक शिक्षक पात्रता परीक्षा फार्म मिलने मे इन दिनो जिन कठिनाईयों या यूं कह ले की कुव्यवस्था का सामना अभ्यर्थियों को करना पड रहा है , ये सरासर सरकार के द्वारा की गई बदइंतजामी का नतीजा है । आज सूचना युग के दौर मे विभिन्न उच्चस्तरीय माध्यमों के होते हुए भी , कोई परीक्षा फार्म केवल चुने हुए कुछ जगहों से अगर मिलता हो, तो ये सरकारी मानसिकता समझ के परे है । अभ्यर्थियों को घंटों कतार मे खडे रहकर इस भीषण गर्मी मे जो परेशानी हो रही है, और इसके बाद कई तरह से और भी जो समस्याएं उठ खडी हो रही है ...वो सरकार के लिए आने वाले दिनों मे एक बडा सरदर्द साबित होने जा रही है ।


पथराव, गाली-गलौज, हंगामा और उस पर से  फार्म लेने गई महिलाओं को चोट लगना...इस तरह की गतिविधियां सरकारी नीति निर्धारकों को कटघरे मे खडा करने के लिए काफी है ।कहीं  शिक्षा पदाधिकारी के कार्यालय को फूंक दिया जा रहा है तो और कही एसबीआई की शाखा में तोड़फोड़ की जा रही है । कही नारेबाजी के बीच छात्रों के द्वारा एसबीआई की शाखा और एटीएम पर धावा बोल दिया जाता है। और तो और वहां तैनान होमगार्ड के जवानो द्वारा इन सब पर नियंत्रन करने के लिए राइफल तान दी जाती है । डीईओ कार्यालय रणक्षेत्र में तब्दील हो जाता है, काउंटर पर अचानक हजारों की संख्या में भीड़ उमड़ कर स्थिती बिगाड जा रही है ।

सुशासन के दौर मे इस तरह से आम जनता को विपत्ति मे डालना कही न कही इस बात को दर्शा रहा है कि वाकई नीतीश सरकार भी अब फिल-गुड वाली स्थिती मे आ चली है । हमे कुछ और नही बस विशेष राज्य का दर्जा चाहिए कहकर मुख्यमंत्री अपनी बात बडी मजबूती से रखते है ..पर वही उनके राज्य की जनता खराब प्रशासनिक व्यवस्था का शिकार बन रही है । उत्पाती छात्रों द्वारा उत्पात मचाया जा रहा है, मगर इसके चपेटे मे आम जन् तथा सरकारी तंत्र भी आ जा रहे है । ये सब बिना इन उत्पातों के भी हो सकता था । ये कहा जाता रहा है कि व्यवस्था मस्तिष्क की पवित्रता है , शरीर का स्वास्थ्य है , शहर की शान्ति है , देश की सुरक्षा है । जो सम्बन्ध धरन ( बीम ) का घर से है , या हड्डी का शरीर से है , वही सम्बन्ध व्यवस्था का सब चीजों से है । और इसी व्यवस्था की कमी और अदूरदर्शीता ने सारा काम बिगाड रखा है ।  

अच्छा तो यही होता की सरकार इस फार्म को प्राप्त करने के स्थानों को बढाती और साथ ही साथ आनलाइन फार्म मिलने एवं भरने की व्यवस्था भी कराती । अगर समय रहते कुछ इस तरह के कदम नही उठाये गये तो निश्चित तौर पर इस प्रारंभिक शिक्षक पात्रता परीक्षा फार्म के चक्कर मे कई लोगों की जान पर आफत बन पडेगी । सरकार समझे की प्रस्तुत उलझनें और दुष्प्रवृत्तियाँ कहीं आसमान से नहीं टपकीं, बल्कि ये उनकी अपनी उगाई और बढ़ाई हुई हैं। और अपनी गलती स्वीकार कर लेने में लज्जा की कोई बात नहीं है, हां इससे दूसरे शब्दों में यही प्रमाणित होता है कि कल की अपेक्षा आज आप अधिक समझदार हैं ।